पहलों की घटनाओं और कहानियों से कुरआन का मुकाबला करना और लोगों के करआन सनने का अवसर न मिलने देना । मुशरिक अपने उपरोक्त सन्देहों को फैलाने के अलावा हर संभव तरीके से लोगों को कुरआन सुनने से दूर रखने की कोशिश भी करते थे , इसलिए वे लोगों को ऐसी जगहों से भगाते और जब देखते कि मोहम्मद दावत व तब्लीग़ से उठा चाहते हैं या नमाज़ में कुरआन की तिलावत फरमा रहे हैं तो शोर करते और तालियां और सीटियां बजाते । अल्लाह फ़रमाता है , कुफ़्फ़ार ने कहा , यह कुरआन न सुनो और इसमें शोर मचाओ , ताकि तुम ग़ालिब रहो । इस स्थिति का नतीजा यह था कि मोहम्मद को उनके मजमों और मरिफलों के अन्दर पहली बार कुरआन तिलावत करने का मौका पांचवें सन् नुबूवत के आखिर में मिल सका , वह भी इस तरह कि आपने अचानक खड़े होकर कुरआन की तिलावत शुरू कर दी और पहले किसी को इसका अन्दाज़ा न हो सका । नज बिन हारिस कुरैश के शैतानों में से एक शैतान था । वह हियरा गया । वहां बादशाहों की कहानियां और रुस्तम व स्फ़न्दयार के किस्से सीखे , फिर वापस आया , तो जब मोहम्मद किसी जगह बैठकर अल्लाह की बातें करते और उसकी पकड़ से लोगों को डराते तो आपके बाद यह आदमी वहां पहुंच जाता और कहता कि अल्लाह की कसम ! महम्मद सल्ल० की बातें मुझसे बेहतर नहीं ।
इसके बाद वह फ़ारस के बादशाहों और रुस्तम व स्फन्दयार की कहानियां सुनाता , फिर कहता , आखिर किस वजह से मुहम्मद की बात मुझसे बेहतर है ?
इब्ने अब्बास की एक रिवायत है कि नन ने एक लौडी ख़रीदी थी , जब वह किसी आदमी के बारे में सुनता कि यह मोहम्मद की तरफ मायल है तो उस लौंडी के पास ले जाकर कहता कि इसे खिलाओ - पिलाओ और गाने सुनाओ । यह तुम्हारे लिए उससे बेहतर है जिसकी तरफ़ तुमको मुहम्मद बुलाते हैं । उसके बारे में अल्लाह का यह इर्शाद उतरा ' कुछ लोग ऐसे हैं जो खेल की बात खरीदते हैं , ताकि अल्लाह की राह से भटका दें । अत्याचार और दमन - चक्र सन् 04 नुबूवत में इस्लामी दावत के सामने आने के बाद मुश्रिकों ने उसके खात्मे के लिए पिछली कार्रवाइयां धीरे - धीरे अंजाम दीं । महीनों इससे आगे कदम नहीं बढ़ाया और जुल्म व ज़्यादती शुरू नहीं की , लेकिन जब देखा ये तरीके इस्लामी दावत को नाकाम बनाने में असरदार साबित नहीं हो रहे हैं तो आपसी मश्विरे से तै किया कि मुसलमानों को सज़ाएं दे - देकर उनको उनके दीन से बाज़ रखा जाए । इसके बाद हर सरदार ने अपने क़बीले के मातहत लोगों को , जो मुसलमान हो गए थे , सज़ाएं देनी शुरू की और हर मालिक अपने ईमान लाने वाले गलामों पर ट्ट पड़ा और यह बात तो बिल्कुल स्वाभाविक थी कि दमछल्ले और गुंडे अपने सरदारों के पीछे दौड़े और उनकी मज़ी और ख्वाहिशों के मुताबिक़ हरकत करें । इसलिए मुसलमानों और खास तौर से कमज़ोरों पर ऐसी - ऐसी मसीबतें तोड़ी गई और उन्हें ऐसी - ऐसी सज़ाएं दी गईं , जिन्हें सनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और दिल फट जाता है । नीचे केवल एक झलक दी जा रही है
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