Tuesday, 1 October 2019

सीना खुलने की घटना

    इस तरह मोहम्मद  दूध पिलाने की मुद्दत ख़त्म होने के बाद भी बनू साद ही में रहे यहां तक कि जन्म के चौथे या पांचवें साल मुबारक सीना चाक किए जाने की घटना घटी ।
    इसका पूरा विवरण हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में मिलता है जो सहीह मुस्लिम में अंकित है कि मोहम्मद  के पास हज़रत जिबील अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए । आप बच्चों के साथ खेल रहे थे । हज़रत जिबील ने आपको पकड़ कर पटका और सीना चाक करके दिल निकाला फिर दिल से एक लोथडा निकाल कर फरमाया यह तमसे शैतान का हिस्सा है फिर दिल को एक तश्त में ज़मज़म के पानी से धोया और फिर उसे जोड़ कर उसकी जगह लौटा दिया इधर बच्चे दौड़ कर आपकी मां अर्थात दाई के पास पहुंचे और कहने लगे मुहम्मद क़त्ल कर दिया गया उनके घर के लोग झट - पट पहुंचे देखा तो आपका रंग उतरा हुआ था (उसने सपना देखा था)  । मां की गोद में इस घटना के बाद हलीमा को खतरा महसूस हुआ और उन्होंने आपको  आपकी मां के हवाले कर दिया,  इसलिए आप छ : साल की उम्र तक मां ही की गोद में पलते रहे ।
       उधर हज़रत आमिना का इरादा हुआ कि वह अपने मृत पति की याद में यसरिब जाकर उनकी कब की जियारत करें इसलिए  वह अपने यतीम बच्चे मुहम्मदअपनी सेविका उम्मे ऐमन और अपने गार्जियन अब्दुल मुत्तलिब के साथ कोई पांच सौ किलोमीटर की दूरी तै करके मदीना तशरीफ़ ले गई और वहां एक महीने तक ठहर कर वापस हुई लेकिन अभी रास्ते ही में थीं कि बीमारी ने आ लिया । फिर यह बीमारी तेज़ी अख्तियार कर गई यहां तक कि मक्का और मदीना के बीच अबवा नामी स्थान पर पहुंच कर वफ़ात पा गई ।
    दादा की निगरानी में बूढ़े अब्दुल मुत्तलिब अपने पोते को लेकर मक्का पहुंचे । उनका हृदय अपने इस यतीम पोते के प्रति प्रेम व स्नेह से ओत - प्रोत था इसलिए भी ऐसा हुआ कि अब उसे एक नयी चोट लगी थी जिसने पुराने घाव कुरेद दिए थे । अब्दुल मुत्तलिब अपने पोते के लिए इतने नम्र स्वभाव थे कि अपने बेटों के लिए इतने न रहे होंगे ।

मोहम्मद के पिता अब्दुल्लाह संछिप्त बिवरण

3 . अब्दुल्लाह ,

     मोहम्मद के पिता इनकी मां का नाम फातमा था और वह अम्र बिन आइज़ बिन इम्रान बिन मजूम बिन यक़ज़ा बिन मुर्रा की बेटी थीं । अब्दुल मुत्तलिब की सन्तान में अब्दुल्लाह सबसे ज़्यादा खूबसूरत , पाक दामन और चहेते थे और ' ज़बीह '   कहलाते थे । ज़बीह कहलाने की वजह यह थी कि जब अब्दुल मुत्तलिब के लडकों की तायदाद पूरी दस हो गई और वे बचाव करने के योग्य हो गये तो अब्दल मत्तलिब ने उन्हें अपनी मन्नत बता दी । सब ने बात मान ली । इसके बाद कहा जाता है कि अब्दुल मुत्तलिब ने उनके दर्मियान कुरआअन्दाजी की तो करआ अब्दल्लाह के नाम निकला ।
    वह सबसे प्रिय थे , इसलिए अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि ' ऐ अल्लाह ! वह या सौ ऊंट ? फिर उनके और ऊंटों के दर्मियान करआअन्दाजी की तो कुरआ सौ ऊंटों पर निकल आया । और कहा जाता है कि अब्दल मुत्तलिब ने भाग्य के तीरों पर इन सब के नाम लिखे और हबल के निगरां के हवाले किया । निगरां ने तीरों को गर्दिश देकर कुरआ निकाला , तो अब्दुल्लाह का नाम निकला । अब्दुल मुत्तलिब ने अब्दुल्लाह का हाथ पकड़ा , छुरी ली और जिव्ह करने के लिए खाना काबा के पास ले गये लेकिन कुरैश और खास तौर से अब्दुल्लाह के ननिहाल वाले अर्थात बनू मख्जूम और अब्दुल्लाह के भाई अबू तालिब आड़े आए ।
    अब्दुल मुत्तलिब ने कहा , तब मैं अपनी मन्नत का क्या करूं ? उन्होंने मश्विरा दिया कि वह किसी महिला अर्राफ़ा के पास जाकर हल मालूम कर लें । अब्दुल मुत्तलिब अर्राफ़ा के पास गए । उसने कहा कि अब्दुल्लह और दस ऊंटों के दर्मियान कुरआ डालें । अगर अब्दुल्लाह के नाम कुरआ निकले तो दस ऊंट और बढ़ा दें । इस तरह ऊंट बढ़ाते जाएं और कुरआ निकालते जाएं , यहां तक कि अल्लाह राज़ी हो जाए । फिर ऊंटों के नाम कुरआ निकल आए तो उन्हें जिब्ह कर दें । अब्दुल मुत्तलिब ने वापस आकर अब्दुल्लाह और दस ऊंटों के बीच कुरआ डाला , मगर कुरआ अब्दुल्लाह के नाम निकला । इसके बाद वह दस - दस ऊंट बढ़ाते गए और कुरआ डालते गये , मगर कुरआ अब्दुल्लाह के नाम ही निकलता रहा । (रूहानी ताकतों ने भी कोशिश किया था कि मोहम्मद पैदा ना हो) जब सौ ऊंट पूरे हो गये , तो कुरआ ऊंटों के नाम निकला । अब अब्दुल मुत्तलिब ने उन्हें अब्दल्लाह के बदले जिब्ह कर दिया और वहीं छोड़ दिया । किसी इंसान या दरिंदे के लिए कोई रुकावट न थी । इस घटना से पहले कुरैश और अरब में खन बहा ( दियत ) की मात्रा दस ऊंट थी , पर इस घटना के बाद सों कर दी गई । इस्लाम ने भी इस मात्रा को बाक़ी रखा ।
मोहम्मद कहा करता था की मैं दो ज़बीह की सन्तान हूं - एक हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम और दूसरे आपके पिता अब्दुल्लाह । । अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे अब्दुल्लाह की शादी के लिए हज़रत आमना को चुना जो वस्व बिन अब्दे मुनाफ बिन ज़ोहरा बिन किलाब की सुपुत्री थीं और वंश और पद की दृष्टि से कुरैश की उच्चतम महिला मानी जाती थीं । उनके पिता वंश और श्रेष्ठता की दृष्टि से बनू जोहरा के सरदार थे । वह मक्का ही में विदा होकर हज़रत अब्दुल्लाह के पास आई , मगर थोड़े दिनों बाद अब्दुल्लाह को अब्दुल मुत्तलिब ने खजूर लाने के लिए मदीना भेजा और उनका वहीं देहान्त हो गया ।
     कुछ सीरत के विशेषज्ञ कहते हैं कि वह व्यापार के लिए शाम देश गए हुए थे । करैश के एक काफिले के साथ वापस आते हए बीमार होकर मदीना उतरे और देहान्त हो गया । नाबग़ा जादी के मकान में दफन किए गए । उस वक़्त उनकी उम्र 25 वर्ष थी । अधिकांश इतिहासकार के अनुसार अभी मोहम्मद  पैदा नहीं हुए थे , अलबत्ता कुछ सीरत लिखने वाले कहते हैं कि आपका जन्म उनके देहान्त से दो महीने पहले हो चुका था ।
      जब उनके देहान्त की खबर मक्का पहुंची , तो हज़रत आमना ने बड़ा ही दर्द भरा मर्सिया ( शोक गीत ) कहा , जो यह है
     ' बतहा की गोद हाशिम के बेटे से खाली हो गई । वह चीख - पुकार के दर्मियान एक क़ब में सो गया । उसे मौत ने एक पुकार लगाई और उसने ' हां ' कह दिया । अब मौत ने लोगों में इले हाशिम जैसा कोई इंसान नहीं छोड़ा । ( कितनी हसरत भरी थी ) वह शाम जब लोग उन्हें तख्त पर उठाए ले जा रहे थे । अगर मौत और मौत की घटना ने उनका वजूद खत्म कर दिया है , ( तो उनके चरित्र के चिह्न नहीं मिटाए जा सकते ) वह बड़े दाता और दयालु थे ।
अब्दुल्लाह का छोड़ा हुआ कुल सामान यह था
पांच ऊंट , बकरियों का रेवड़ , एक हब्शी लौंडी जिनका नाम बरकत था और उपनाम उम्मे ऐमन , यही उम्मे ऐमन हैं , जिन्होंने मोहम्मद  को गोद में खिलाया था ।
जन्म और पाक जिंदगी के चालीस साल जन्म मोहम्मद  मक्का में शाबे बनी हाशिम के अन्दर 9 रबीउल अव्वल सन् 01 आमुल फील ( हाथी का साल ) सोमवार के दिन सबह के वक़्त पैदा हुए । उस वक़्त नौशेरवां के सत्तासीन होने का चालीसवां साल था और 20 या 22 अप्रैल सन् 571 ई० की तारीख थी । अल्लामा मुहम्मद सुलैमान साहब सलमान मन्सूरपुरी रह० और महमूद पाशा फलकी की खोज यही है । इले साद की रिवायत है कि मोहम्मद  की मां ने फ़रमाया , जब आपका जन्म हुआ , तो मेरे जिस्म से एक नर निकला , जिससे शाम देश के महल रोशन हो गए ।
   इमाम अहमद और दारमी आदि ने हज़रत इरनाज़ बिन सारिया से भी लगभग इसी विषय की एक रिवायत नक़ल फ़रमाई है । कुछ रिवायतों में बताया गया है कि जन्म के समय कुछ घटनाएं नुबूवत का पता देने वाली भी हुईं , अर्थात किसरा के महल के चौदह कंगूरे गिर गए , मजूस का अग्निकुंड ठंडा हो गया । सारा सागर सूख गया और उसके गिरजे ढह गए । 
यह तबरी और बैहक़ी वगैरह की रिवायत है ,   मगर इसकी सनद के लिए सबूत नहीं मिल सका है और इन क़ौमों की तारीख से भी इसकी कोई गवाही नहीं मिलती , हालांकि इन घटनाओं को लिपिबद्ध किए जाने का मज़बूत तत्त्व मौजूद था ।
     जन्म के बाद आपकी मां ने अब्दुल मुत्तलिब के पास पोते की शुभ - सूचना भिजवाई । वह खुश - खुश तशरीफ़ लाए और आपको खाना काबा में ले जाकर अल्लाह से दुआ की और उसका शुक्र अदा किया और आपका नाम मुहम्मद रखा ।
    यह नाम अरब में जाना - पहचाना न था । फिर अरब रिवाज के मुताबिक़ सातवें दिन खला किया । आपको आपकी मां के एक सप्ताह बाद सबसे पहले अब लहब की लौंडी सुवैबा ने दूध पिलाया । उस वक़्त उसकी गोद में जो बच्चा था , उसका नाम मसरूह था ।
     सुवैबा ने आपसे पहले हज़रत हमजा बिन अब्दुल मुत्तलिब को और आपके बाद अबू सलमा बिन अब्दुल असद मख्मी को भी दूध पिलाया था ।

मोहम्मद के 10 चाचा 6 बुआ और उनका नाम

मोहम्मद के 10 चाचा

  अब्दुल मुत्तलिब के कुल दस बेटे थे , जिनके नाम ये हैं 
1- हारिस
2-जुबैर
3-अबू तालिब
4-अब्दुल्लाह (मोहम्मद का बाप)
5- हमज़ा
6-अबूलहब
7-गैदान
8-मकूम
9-सफ़ार
10-अब्बास ।
   कुछ ने कहा कि ग्यारह थे । एक का नाम क़सम था और कुछ और लोगों ने कहा है कि तेरह थे , एक का नाम अब्दुल काबा था और एक का नाम हज्ल था , लेकिन दस मानने वालों का कहना है कि मकूम ही का दूसरा नाम अब्दुल काबा और गैदाक़ का दूसरा नाम हल था और क़स्म नाम का कोई व्यक्ति अब्दुल मुत्तलिब की सन्तान में न था ।

मोहम्मद के 6 बुआ


अब्दुल मत्तलिब की बेटियां छः थीं नाम इस तरह हैं
1- उम्मूल हकीम इनका नाम बेंज़ा है ,
2- बर्रा ,
3- आतिका .
4- सफ़िया .
5- अरवा ,
6- उमैमा ।

हाथी की घटना

दूसरी हाथी की घटना

दूसरी घटना का सार यह है कि अबरहा सबाह हब्शी ने जो नजाशी बादशाह हब्श की ओर से यमन का गवर्नर जनरल था जब देखा कि अरब खाना काबा का हज करते हैं तो सनआ में एक बहुत बड़ा चर्च बनवाया और चाहा कि अरब का हज उसी की ओर फेर दे मगर जब इसकी खबर बनू किनाना के एक व्यक्ति को हुई तो उसने रात के वक़्त चर्च में घुस कर उसके किबले पर पाखाना पोत दिया अबरहा को पता चला तो बहुत बिगड़ा और साठ हज़ार की एक भारी सेना  लेकर काबा को ढाने के लिए निकल खड़ा हुआ ।
    उसने अपने लिए एक जबरदस्त हाथी भी चुना । सेना में कुल नौ या तेरह हाथी थे । अबरहा यमन से धावा बोलता हुआ मुग़म्मस पहुंचा और वहां अपनी सेना को तीब देकर और हाथी को तैयार करके मक्के में दाखिले के लिए चल पड़ा । जब मुज़दलफ्रा और भिना के बीच मुहस्सिर की घाटी में पहुंचा तो हाथी बैठ गया और काबे की ओर बढ़ने के लिए किसी तरह न उठा । उसका रुख उत्तर दक्षिण या पूरब की ओर किया जाता तो उठकर दौड़ने लगता लेकिन काबे की ओर किया जाता तो बैठ जाता । इसी बीच अल्लाह ने चिड़ियों का एक झुंड भेज दिया जिसने सेना पर ठीकरी जैसे पत्थर गिराए और अल्लाह ने उसी से उन्हें खाए हुए भुस की तरह बना दिया । ये चिड़ियां अबाबील जैसी थीं । हर चिड़िया के पास तीन - तीन कंकड़ियां थीं - एक चोंच में और दो पंजों में । कंकड़ियां चने जैसी थीं मगर जिस किसी को लग जाती थीं उसके अंग कटना शुरू हो जाते थे और वह मर जाता था । ये कंकड़ियां हर आदमी को नहीं लगी थीं लेकिन सेना में ऐसी भगदड़ मची कि हर व्यक्ति दूसरे को रौंदता - कचलता गिरता - पड़ता भाग रहा था । फिर भागने वाले हर राह पर गिर रहे थे और हर चश्मे पर मर रहे थे । इधर अबरहा पर अल्लाह ने ऐसी आफ़त भेजी कि उसकी उंगलियों के पोर झड़ गए और सनआ पहुंचते - पहुंचते चूजे जैसा हो गया । फिर उसका सीनः फट गया दिल बाहर निकल आया और वह मर गया ।
      अबरहा के इस हमले के मौके पर मक्का के निवासी जान के डर से घाटियों में बिखर गए थे और पहाड़ की चोटियों पर जा छिपे थे । जब सेना पर अज़ाब आ गया तो इत्मीनान से अपने घरों को पलट आए ।
     यह घटना अधिकांश विशेषज्ञों के अनुसार मोहम्मद की पैदाइश से सिर्फ पचास या पचपन दिन पहले मुहर्रम महीने में घटी थी इसलिए यह सन् 571 ई० की फरवरी के आखिर की या मार्च के शुरू की घटना है । सच तो यह है कि यह एक आरंभिक निशानी थी जो अल्लाह ने अपने नबी और अपने काबा के लिए ज़ाहिर फ़रमाई थी क्योंकि आप बैतुल - मविदस को देखिए कि अपने युग में मुसलमानों का क़िबला था और वहां के रहने वाले मुसलमान थे । इसके बावजूद उस पर अल्लाह के दश्मन अर्थात मुशरिकों का कब्जा हो गया था जैसा कि बख्ने नस्र के हमले ( 587 ई०पू० ) और रूम वालों के कब्जे ( सन् 70 ई० ) से ज़ाहिर है । लेकिन इसके बिल्कल उलट काबे पर ईसाइयों को कब्जा न मिल सका हालांकि उस वक़्त यही मुसलमान थे और काबे के रहने वाले मुशरिक थे । फिर यह घटना ऐसी परिस्थितियों में घटित हुई कि इसकी खबर उस वक़्त के सभ्य जगत के अधिकांश क्षेत्रों अर्थात रूम और फारस में तुरन्त पहुंच गई क्योंकि हब्शा का रूमियों से बड़ा गहरा ताल्लुक था और दूसरी ओर फ्रारसियों की नज़र रूमियों पर बराबर रहती थी और वह रूमियों और उनके मित्रों के साथ होने वाली घटनाओं का बराबर जायज़ा लेते रहते थे । यही वजह है कि इस घटना के बाद फ़ारस वालों ने यमन पर बड़ी तेजी से क़ब्ज़ा कर लिया ।
    अब चूंकि यही दो राज्य उस वक़्त सभ्य जगत के अहम भाग के प्रतिनिधि थे इसलिए इस घटना की वजह से दुनिया की निगाहें खाना काबा की ओर उठने लगी । उन्हें बैतुल्लाह की बड़ाई का एक खुला हुआ खुदा का निशान दिखाई पड़ गया और यह बात दिलों में अच्छी तरह बैठ गई कि इस घर को अल्लाह ने पावनता के लिए चुन लिया है इसलिए आगे यहां की आबादी से किसी व्यक्ति का नबी होने के दावे के साथ उठना इस घटना के तक़ाज़े के अनुकूल ही होगा और उस खुदाई हिक्मत की तफ़सीर होगा जो कार्य - कारण के नियम से ऊपर उठकर ईमान वालों के खिलाफ़ मुश्रिकों की सहायता में छिपी हुई थी ।

ज़मज़म के कुंएं की खुदाई

ज़मज़म के कुंएं की खुदाई    

पहली घटना का सार यह है कि अब्दुल मुत्तलिब ने सपना देखा कि उन्हें ज़मज़म का कुंवां खोदने का हुक्म दिया जा रहा है और सपने ही में उन्हें उसकी जगह भी बताई गई । उन्होंने जागने के बाद खुदाई शुरू की और धीरे - धीरे वे चीजें बरामद हुईं जिन्हें बनू जुरहुम ने मक्का छोड़ते वक़्त ज़मज़म के कुंएं में गाड़ दी थी अर्थात तलवारें कवच और सोने के दोनों हिरन । अब्दुल मुत्तलिब ने तलवारों से काबे का दरवाजा ढाला । सोने के दोनों हिरन भी दरवाज़े ही में फिट किए और हाजियों को ज़मज़म पिलाने की व्यवस्था की । खुदाई के दौजांघ यह घटना भी घटी कि जब ज़मज़म का कुंवां प्रकट हो गया तो कुरैश ने अब्दुल मुत्तलिब से झगड़ा शुरू किया और मांग की कि हमें भी खुदाई में शरीक कर लो ।
    अब्दुल मुत्तलिब ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता । मैं इस काम के लिए मुख्य रूप से नियुक्त किया गया हूं लेकिन कुरैश के लोग न माने यहां तक कि फैसले के लिए बन साद की काहिना औरत के पास जाना तै हआ और लोग मक्का से रवाना भी हो गए लेकिन रास्ते में पानी खत्म हो गया । अल्लाह ने अब्दुल मुत्तलिब पर बारिश बरसाई जिससे उन्हें ज़्यादा पानी मिल गया जबकि विरोधियों पर एक बूंद पानी न बरसा । वे समझ गए कि ज़मज़म का काम कुदरत की ओर से अब्दुल मुत्तलिब के साथ मुख्य है इसलिए रास्ते ही से वापस पलट आए । यही मौक़ा था जब अब्दुल मुत्तलिब ने मन्नत मानी कि अगर अल्लाह ने उन्हें दस लड़के दिए और वे सब के सब इस उम्र को पहंचे कि उनका बचाव कर सकें तो वह एक लड़के को काबे के पास कुर्बान कर देंगे ।

मोहम्मद का परिवार


मोहम्मद का परिवार अपने पूर्वज हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ से जुड़ने से हाशमी परिवार के नाम से प्रसिद्ध है । इसलिए मुनासिब मालूम होता है कि हाशिम और उसके बाद के कुछ लोगों के संक्षिप्त हालात पेश कर दिए जाएं । 

1 . हाशिम

हम बता चुके हैं कि जब बनू अब्दे मुनाफ़ और बनू अब्दुद्दार के बीच पदों के बंटवारे पर समझौता हो गया तो अब्दे मुनाफ़ की सन्तान में हाशिम ही को सिक़ाया और रिफ़ादा यानी हाजियों को पानी पिलाने और उनका सत्कार करने का पद प्राप्त हुआ । हाशिम बड़े प्रतिष्ठित और मालदार व्यक्ति थे । यह पहले व्यक्ति हैं , जिन्होंने मक्के में हाजियों को शोरबा रोटी सान कर खिलाने का प्रबन्ध किया । उनका असल नाम अम्र था , लेकिन रोटी तोड़ कर शोरबे में सामने की वजह से उनको हाशिम कहा जाने लगा , क्योंकि हाशिम का अर्थ है तोड़ने वाला , फिर यही हाशिम वह पहले आदमी हैं , जिन्होंने कुरैश के लिए गर्मी और जाड़े की दो वार्षिक व्यापारिक यात्राओं की बुनियाद रखी । उनके बारे में कवि कहता है
' यह अम्र ही हैं , जिन्होंने अकाल की मारी हुई अपनी कमज़ोर क़ौम को मक्के में रोटियां तोड़ कर शोरबे में भिगो - भिगोकर खिलाईं और जाड़े और गर्मी की दोनों यात्राओं की बुनियाद रखी ।
 ' उनकी एक महत्वपूर्ण घटना यह है कि वे व्यापार के लिए शाम देश गये । रास्ते में मदीना पहुंचे तो वहां क़बीला बनी नज्जार की एक महिला सलमा बिन्त अम्र से विवाह कर लिया और कुछ दिनों वहीं ठहरे रहे । फिर बीवी को हमल की हालत में मां के यहां ही छोड़कर शाम देश रवाना हो गए और वहां जाकर फलस्तीन के शहर ग़ज़्ज़ा में देहान्त हो गया । इधर सलमा के पेट से बच्चा पैदा हआ ।
  यह सन 497 ई० की बात है . चंकि बच्चे के सर के बालों में सफ़ेदी थी , इसलिए सलमा ने उसका नाम शैबा रखा और यसरिब(मदीना)में अपनी मां के घर ही में उसकी परवरिश की । आगे चलकर यही बच्चा अब्दुल मुत्तलिब के नाम से प्रसिद्ध हआ । एक समय तक हाशिम परिवार के किसी व्यक्ति को उसके अस्तित्व का ज्ञान न हो सका ।
हाशिम के कुल चार बेटे और पांच बेटियां थीं । असद , अबू सैफ़ी , फुजला , अब्दुल मुत्तलिब - शिफ़ा , खालिदा , ज़ईफ़ा , रुकैया और जन्नः ।

2 . अब्दुल मुत्तलिब

पिछले पृष्ठों से मालूम हो चुका है कि सिकाया और रिफ़ादा का पद हाशिम के बाद उनके भाई मुत्तलिब को मिला । इनमें भी बड़ी खबियां थी . और इन्हें भी अपनी कौम में बडी प्रतिष्ठा प्राप्त थी । इनकी बात टाली नहीं जाती थी । इनकी दानशीलता के कारण कुरैश ने इनको दानी की उपाधि दे रखी थी । जब शैबा यानी अब्दुल मुत्तलिब , सात या आठ वर्ष के हो गए तो मत्तलिब को इनके बारे में मालम हआ और वह इन्हें लेने के लिए रवाना हुए । जब यसरिब के करीब पहुंचे और शैबा पर नज़र पड़ी तो आंखों में आंसू आ गए । उन्हें सीने से लगा लिया और फिर अपनी सवारी पर पीछे बिठाकर मक्का के लिए रवाना हो गये । मगर शैबा ने मां की इजाजत के बिना साथ जाने से इंकार कर दिया । इसलिए मुत्तलिब उनकी मां से इजाज़त चाहने लगे , पर मां ने इजाज़त न दी , आखिर मुत्तलिब ने कहा कि यह अपने बाप की हुकूमत और अल्लाह के हरम की ओर जा रहे हैं , इस पर मां ने इजाज़त दे दी और मुत्तलिब इन्हें ऊंट पर बिठा कर मक्का ले आए । मक्का वालों ने देखा तो कहा , यह अब्दुल मुत्तलिब है , यानी मुत्तलिब का दास है । मुत्तलिब ने कहा , नहीं , नहीं , यह मेरा भतीजा अर्थात मेरे भाई हाशिम का लड़का है । फिर शैबा मुत्तलिब के पास पले - बढ़े और जवान हुए । इसके बाद रोमान ( यमन ) नामी जगह पर मुत्तलिब की मृत्यु हो गई और उनके छोड़े हुए पद अब्दुल मुत्तलिब को मिल गए । अब्दुल मुत्तलिब ने अपनी क़ौम में इतना ऊंचा स्थान प्राप्त किया कि उनके बाप - दादों में भी कोई इस स्थान को न पहुंच सका था । क़ौम ने उन्हें दिल से चाहा और उनका बड़ा मान - सम्मान किया ।
   जब मुत्तलिब की मृत्यु हो गई तो नौफुल ने अब्दुल मुत्तलिब के आंगन पर बलात् कब्जा कर लिया । अब्दुल मुत्तलिब ने कुरैश के कुछ लोगों से अपने चचा के खिलाफ़ मदद चाही , लेकिन उन्होंने यह कहकर विवशता व्यक्त कर दी कि हम तम्हारे और तुम्हारे चचा के बीच हस्तक्षेप नहीं कर सकते । आखिर अब्दुल मत्तलिब ने बनी नज्जार में अपने मामा को कुछ कविता लिख भेजी जिसमें उनसे सहायता मांगी थी । जवाब में उनका मामा अबू साद बिन अदी अस्सी सवार लेकर रवाना आ और मक्का के करीब अबतह में उतरा । अब्दुल मुत्तलिब ने वहीं मुलाकात की और कहा , मामूं जान ! घर तशरीफ़ ले चलें ।
     अबू साद ने कहा , नहीं , ख़ुदा की क़सम ! यहां तक कि नैफुल से मिल लूं । इसके बाद अबू साद आगे बढ़ा और नौफुल के सर पर आ खड़ा हुआ । नौफ़ल हतीम में कुरैश के सरदारों के साथ बैठा था । अब साद ने तलवार भांजते हुए कहा  ' इस घर के रब की क़सम ! अगर तुमने मेरे भांजे की ज़मीन वापस न की , तो यह तलवार तुम्हारे अन्दर घुसा दूंगा । ' नौफुल ने कहा , ' अच्छा लो , मैंने वापस कर दी । ' इस पर अबू साद ने कुरैश के सरदारों को गवाह बनाया , फिर अब्दुल मुत्तलिब के घर गया और तीन दिन ठहर कर उमरा करने के बाद मदीना वापस चला गया ।
     इस घटना के बाद नौफुल ने बनी हाशिम के खिलाफ बनी अब्दे शम्स से आपस में एक दूसरे की सहायता का समझौता किया । इधर बनू खुजाआ ने देखा कि बनू नज्जार ने अब्दुल मुत्तलिब की इस तरह मदद की है , तो कहने लगे कि अब्दुल मुत्तलिब जिस तरह तुम्हारी सन्तान है , हमारी भी सन्तान है , इसलिए हम पर उसकी मदद का हक़ ज़्यादा है ।
    इसकी वजह यह थी कि अब्दे मुनाफ़ की मां क़बीला खुजाआ ही से ताल्लुक रखती थीं , इसलिए बनू खुज़ाआ ने दारुन्नदवा में जाकर बनू अब्द शम्स और बनी नौफुल के खिलाफ़ बनू हाशिम से सहयोग का समझौता किया । यही समझौता था जो आगे चलकर इस्लामी युग में मक्का विजय का कारण बना । विस्तृत विवरण आगे आ रहा है । बैतुल्लाह के ताल्लुक़ से अब्दुल मुत्तलिब के साथ दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी
    एक ज़मज़म के कुएं की खुदाई की घटना , और दूसरी हाथी की घटना ।

मोहम्मद का वंश

मोहम्मद का वंश - क्रम तीन भागों में बांटा जा सकता है ।


पहला भाग ,

  जिसके सही होने पर वंश - विशेषज्ञ सहमत हैं , यह अदनान तक पहुंचता है ।  

दूसरा भाग

 जिसमें विशेषज्ञों का मतभेद है , किसी ने माना , किसी ने नहीं माना , यह अदनान से ऊपर हज़रत इबाहीम अलैहिस्सलाम तक का है ।

तीसरा भाग

जिसमें निश्चित रूप से कुछ ग़लतियां हैं । यह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से ऊपर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तक जाता है । इसकी ओर इशारा गुज़र चुका है ।

        नीचे इन तीनों भागों को कुछ विस्तार में लिखा जा रहा है ।

 पहला भाग

 महम्मद बिन अब्दल्लाह बिन अब्दल मत्तलिब ( शैबा ) बिन हाशिम ( अम्र ) बिन अब्दे मुनाफ़ ( मुग़ीरह ) बिन कुसई ( जैद ) बिन किलाब बिन मुर्रा बिन काब बिन लुई बिन ग़ालिब बिन फ़हर ( इन्हीं की उपाधि कुरैश थी , और क़बीला कुरैश इन्हीं से जुड़ा हुआ है ) बिन मालिक बिन नज्र ( कैस ) बिन किनाना बिन खुजैमा बिन मुदरिका ( आमिर ) बिन इलयास बिन मुज़र बिन नज़्ज़ार बिन मअद्द बिन अदनान ।

 दूसरा भाग 

अदनान से ऊपर यानी अदनान बिन औ बिन हमीसा बिन सलामान , बिन औस बिन पोज बिन क्रमवाल बिन उबई बिन अव्वाम बिन नाशिद बिन हज़ा बिन बलदास बिन यदलाफ़ बिन ताबिख बिन जाहिम बिन नाहिश बिन माखी बिन ऐज़ बिन अबक़र बिन उबैद बिन दुआ बिन हमदान बिन संबर बिन यसरिबी बिन यहजन बिन यलल बिन उरअवी बिन ऐज बिन जीशान बिन ऐसर बिन अफ्रनाद बिन ऐहाम बिन मक्सर बिन नाहिस बिन ज़ारेह बिन समी बिन मजी बिन अवजा बिन अराम बिन कीदार बिन इसमाईल बिन इब्राहीम अलैहिस्सलाम ।

तीसरा भाग

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से ऊपर । इब्राहीम बिन तारेह ( आज़र ) बिन नाहूर बिन सारूअ ( या सारुम ) बिन राअ बिन फ़ालिख बिन आबिर बिन शालिख बिन अरफ़खशद बिन साम बिन नूह अलैहिस्सलाम बिन लामिक बिन मतवशलिख बिन अखनूख ( कहा जाता है कि यह इदरीस अलै० का नाम है ) बिन यर्द बिन महलाईल बिन कीनान बिन आनशा बिन शीस बिन आदम अलैहिस्सलाम ।