Tuesday, 8 October 2019

मक्का में प्रचार प्रसार का समय

हम मोहम्मद की पैग़म्बराना जिंदगी को दो भागों में बांट सकते हैं , जो एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न , स्पष्ट और विख्यात थे । वे दोनों भाग ये हैं

1-  मक्की जिंदगी लगभग 13 साल ,
2-  मदनी जिंदगी - दस साल

     फिर इनमें से हर भाग कई मरहलों पर सम्मिलित है और ये मरहले भी अपनी विशेषताओं की दृष्टि से एक दूसरे से भिन्न और स्पष्ट हैं । इसका अन्दाज़ा आपकी पैग़म्बराना जिंदगी के दोनों भागों में पेश आने वाले अलग - अलग हालात का गहराई से जायजा लेने के बाद हो सकता है । मक्की जिंदगी तीन महरलों पर सम्मिलित थी
1-  छिप - छिपाकर दावत देने का मरहला तीन वर्ष
2-   मक्का वासियों में खुल्लम खुल्ला प्रचार - प्रसार का मरहला - नुबूवत के चौथे साल के शुरू से मदीना की हिजरत तक ।
3- मक्का के बाहर इस्लाम की दावत की लोकप्रियता और फैलाव का मरहला - नुबूवत के दसवें साल के शुरू से यह मरहला मदनी दौर को भी शामिल है और मोहम्मद की जिंदगी के आखिर तक फैला हुआ है । मदनी जिंदगी के मरहलों का विवरण अपनी जगह पर आ रहा है ।

हीरा गुफा और इस्लाम धर्म की तैयारी

हिरा की गुफा में मोहम्मद  की उम्र जब चालीस वर्ष के करीब हो चली और इस बीच आपकी अब तक की ज़िन्दगी ने क़ौम से आपकी सोच और विचार की दूरी बहुत बढ़ा दी थी , तो आपको तहाई बहुत प्रिय रहने लगी , इसलिए आप सत्तू और पानी लेकर मक्का से कोई दो मील दूर हिरा पहाड़ी की एक गुफा में जा रहते 
   यह एक छोटी - सी गुफा है , जिसकी लम्बाई चार गज़ और चौड़ाई पौने दो गज़ है । यह नीचे की ओर गहरी नहीं है , बल्कि एक छोटे - से रास्ते की बग़ल में ऊपर की चट्टानों के आपस में मिलने से एक कोतल की शक्ल लिए हुए है । आप पूरे रमज़ान उस गुफा में ठहरते , अल्लाह की इबादत करते , सृष्टि और उसकी अनेक वस्तुओं पर चिन्तन - मनन करते । आपको अपनी क़ौम के लचर , पोच , शिर्क भरे अक़ीदे ( विश्वास ) और अंधविश्वासी विचारों पर तनिक भर इत्मीनान न था , लेकिन आपके सामने कोई स्पष्ट रास्ता , निश्चित तरीका और अतियों से हटी हुई कोई ऐसी राह न थी , जिस पर आप इत्मीनान और सुकून के साथ आगे बढ़ सकते ।
     मोहम्मद की यह एकान्तप्रियता भी वास्तव में अल्लाह की तबीर का एक हिस्सा थी कि धरती की व्यस्तताओं , ज़िंदगी के शोर और लोगों के छोटे - छोटे दुख - दर्द की दुनिया से आपका कटना उस ' बड़े काम ' की तैयारी के लिए पलटने का बिन्दु हो , जिसका दुनिया को इन्तिज़ार था । और आप बडी अमानत का बोझ उठाने . धरती के रहने वालों को दिशा देने और इतिहास के रुख को मोड़ने के लिए तैयार हो जाएं । अल्लाह ने रिसालत की ज़िम्मेदारी डालने से तीन साल पहले आपके लिए एकान्तप्रियता तै कर दी । आप एकान्त में एक माह तक सृष्टि की स्वच्छन्द आत्मा के साथ यात्रा करते रहते और इस वजूद के पीछे छिपे हुए अनदेखे के भीतर चिन्तन करते , ताकि जब अल्लाह का हुक्म हो तो उस अनदेखे के साथ ताल - मेल बिठाने के लिए मुस्तैद रहें ।

हज़रत ख़दीजा रज़ि० से विवाह

जब आप मक्का वापस तशरीफ़ लाए और हज़रत ख़दीजा रजि० ने अपने माल में ऐसी अमानत और बरकत देखी , जो इससे पहले कभी न देखी थी और इधर उनके दास मैसरा ने आपके मीठे चरित्र और उच्च आचरण , ठंडी सोच , सच्चाई और ईमानदाराना तौर - तरीके के बारे में उद्गार रखे , तो हज़रत ख़दीजा रजि० को जैसे अपना खोया हुआ हीरा मिल गया
    उससे पहले बड़े - बड़े सरदार और रईस उनसे विवाह की इच्छा रखते थे , लेकिन उन्होंने किसी का सन्देश नहीं स्वीकार किया था , अब उन्होंने अपने दिल की बात अपनी सहेली नफीसा बिन्त मुनब्बह से कही और नफ़ीसा ने जाकर मोहम्मद से बातें की ।
     आप तैयार हो गए और अपने चचा से इस मामले में बात की । उन्होंने हज़रत ख़दीजा रजि० के चचा से बात की और विवाह का पैग़ाम दिया । इसके बाद विवाह हो गया । निकाह में बनी हाशिम और मुज़र के सरदार शरीक हुए यह शाम देश से वापसी के दो महीने बाद की बात है ।
     आपने मह में बीस  ऊंट दिए । उस वक़्त हज़रत ख़दीजा की 40वर्ष की थी और वह वंश - धन , सूझ - बूझ की दृष्टि से अपनी क़ौम में सबसे अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त महिला थीं । यह पहली महिला थीं , जिनसे मोहम्मद  ने विवाह किया और उनकी मृत्यु तक किसी दूसरी महिला से विवाह नहीं किया । इबाहीम के अलावा मोहम्मद  की तमाम सन्तानें उन्हीं से थीं । सबसे पहले क़ासिम पैदा हुए और उन्हीं के नाम पर आपको अबुल क़ासिम ( क़ासिम के बाप ) के उपनाम से जाना जाने लगा , फिर जैनब , रुकैया , उम्मे कुलसम , फातिमा और अब्दुल्लाह पैदा हए ।     अब्दुल्लाह की उपाधि तैयब और ताहिर थी । आपके सब बच्चे बचपन ही में मृत्यु की गोद में चले गए । अलबत्ता बच्चियों में से हर एक ने इस्लाम का ज़माना पाया , मुसलमान हुईं और हिजरत की । लेकिन हज़रत फातिमा के सिवा बाकी सब का देहान्त आपकी जिंदगी ही में हो गया । हज़रत फातिमा की मृत्यु आपके छ : महीने बाद हुई ।

काबे का साइज

जब दीवारें पन्द्रह हाथ ऊंची हो गई तो भीतर छ : स्तंभ खड़े करके ऊपर से छत डाल दी गई और काबा अपने पूरे होने के बाद लगभग चौकोर हो गया । अब खाना काबा की ऊंचाई पन्द्रह मीटर है । हजरे अस्वद वाली दीवार और उसके सामने की दीवार अर्थात दक्षिणी और उत्तरी दीवारें दस - दस मीटर हैं । हजरे अस्वद मताफ़ की ज़मीन से डेढ़ मीटर की ऊंचाई पर है । दरवाजे वाली दीवार और उसके सामने की दीवार अर्थात पूरब और पश्चिम की दीवारें 12 - 12 मीटर हैं । दरवाज़ा ज़मीन से दो मीटर ऊंचा है । दीवार के चारों ओर नीचे हर चार तरफ़ से एक बढ़े हुए कुर्सीनुमा जिले का घेरा है जिसकी औसत ऊंचाई 25 सेंटीमीटर और औसत चौड़ाई 30 सेंटीमीटर है । इसे शाज़रवान कहते हैं । यह भी असल में बैतुल्लाह का हिस्सा है , लेकिन कुरैश ने इसे भी छोड़ दिया था ।

आयत उतरने की शुरुआत

तमाम घटनाओं पर भरपूर निगाह डालकर हज़रत जिबील अलैहिस्सलाम के आने की इस घटना की तारीख निश्चित की जा सकती है । हमारी खोज के अनुसार यह घटना रमजान की 21 तारीख को सोमवार की रात में हुई । उस दिन अगस्त की 10 तारीख थी और 610 ईस्वी थी । चांद के हिसाब से मोहम्मद की उम्र चालीस वर्ष छ : महीने बारह दिन और ईसवी हिसाब से 39 साल तीन महीने 22 दिन थी ।

 आइए अब तनिक हज़रत आइशा रजि० की जुबानी इस घटना का विवरण मने जो नबवत का आरंभ - बिन्दु था और जिससे कुफ्र और गुमराहियों की अंधियारियां छटती चली गईं , यहां तक कि जिंदगी की रफ्तार बदल गई और इतिहास का रुख पलट गया । हज़रत आइशा रजि० फ़रमाती हैं , मोहम्मद  पर आयत की शुरूआत नींद में अच्छे सपने से हई । आप जो भी सपने देखते थे , वह सुबह के उजाले की तरह स्पष्ट होता था ।
     फिर आपको अकेलापन अच्छा लगने लगा , इसलिए आप हिरा की गुफा में एकान्त वास करने लगे और कई - कई रात घर वापस आए बिना इबादत में लगे रहते । इसलिए आप खाने - पीने का सामान ले जाते . फिर ( सामान खत्म होने पर ) हज़रत ख़दीजा के पास वापस आते और लगभग उतने ही दिनों के लिए फिर सामान ले जाते , यहां तक कि आपके पास हक़ आया और आप हिरा की गुफा में थे , अर्थात आपके पास फ़रिश्ता आया और उसने कहा , पढ़ो । आपने फ़रमाया , मैं पढ़ा हुआ नहीं हूं । उसने दोबारा पकड़कर दबोचा , फिर छोड़कर कहा , पढ़ो । मैंने फिर कहा , मैं पढ़ा हुआ नहीं हूं । उसने तीसरी बार पकड़कर दबोचा , फिर छोड़कर कहा
' पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया , इंसान को लोथड़े से पैदा किया , पढ़ो और तुम्हारा रब बड़ा ही करीम है । "
 इन आयतों के साथ मोहम्मद  पलटे । आप का दिल धक - धक कर रहा था । हज़रत ख़दीजा बिन्त खुवैलद के पास तशरीफ़ लाए और फ़रमाया , मुझे चादर ओढ़ा दो , मुझे चादर ओढ़ा दो । उन्होंने आपको चादर ओढ़ा दी , यहां तक कि डर जाता रहा ।
   इसके बाद आपने हज़रत ख़दीजा रजि० को घटना की सूचना देते हुए फ़रमाया , यह मुझे क्या हो गया है ? मुझे तो अपनी जान का डर लगता है । हज़रत ख़दीजा रजि० ने कहा , कतई तौर पर नहीं , खुदा की कसम ! आपको अल्लाह रुसवा न करेगा । आप नातेदारों से रिश्ते जोड़ते हैं । बेसहारों का सहारा बनते हैं , जरूरतमंदों की ज़रूरत पूरी करते हैं , मेहमानों का सत्कार करते हैं और परेशानियों में काम आते हैं ।
     इसके बाद हज़रत ख़दीजा रजि० आपको अपने चचेरे भाई वरका बिन नौफुल बिन असद बिन अब्दुल उज़्ज़ा के पास ले गईं । वरका अज्ञानता - युग में ईसाई हो गये थे और इबरानी में लिखना जानते थे । इसलिए इबरानी भाषा में खुदा की तौफ़ीक़ के मुताबिक़ इंजील लिखते थे । उस वक़्त बहुत बूढ़े और अंधे हो चुके थे । उनसे हज़रत ख़दीजा रजि० ने कहा , भाई जान ! आप अपने भतीजे की बात सुनें । वरका ने कहा , भतीजे ! तुम क्या देखते हो ? मोहम्मद  ने जो कुछ देखा , बयान फरमा दिया ।
     इस पर वरका ने आपसे कहा , यह तो वही नामूस ( पवित्रात्मा ) है , जिसे अल्लाह ने मूसा पर उतारा था । काश , उस वक़्त मैं ताक़तवर होता , काश , मैं उस वक़्त ज़िंदा होता , जब आपकी क़ौम आपको निकाल देगी ।
     मोहम्मद  ने फरमाया , अच्छा , तो क्या ये लोग मुझे निकाल देंगे ? वरक़ा ने कहा , हां , जब भी कोई आदमी इस तरह का पैग़ाम लाया , जैसा तुम लाए हो , तो उससे ज़रूर दुश्मनी की गई , और अगर मैंने तुम्हारा समय पा लिया , तो तुम्हारी ज़बरदस्त मदद करूंगा । इसके बाद वरक़ा का जल्द ही देहान्त हो गया और आयत रुक गयी ।

जिब्राइल का आने की शुरुआत

जब आपकी उम्र चालीस वर्ष हो गई और यही परिपक्वता की उम्र है और कहा जाता है कि यही पैग़म्बरों के पैग़म्बर बनाये जाने की उम्र है तो आप महसूस करने लगे , जैसे मक्का में एक एक पत्थर आपको सलाम कर रहा है , साथ ही आपको सच्चे सपने भी नज़र आने लगे । आप जो भी सपना देखते , वह . सुबह के उजालं की तरह प्रकट होता । इस दशा पर छ : माह की मुद्दत बीत गई - जो नुबूवत की मुद्दत का 46वां हिस्सा है और नुबूवत की कुल मुद्दत तेईस वर्ष है - इसके बाद जब हिरा में एकान्तवास का तीसरा वर्ष आया , तो अल्लाह ने चाहा कि धरती के बसने वालों पर उसकी रहमत की वर्षा हो . इसलिए  उसने आपको नुबूवत का पद दिया और हज़रतं जिबील अलैहिस्सलाम कुरआन मजीद की कुछ आयतें लेकर आपके पास तशरीफ़ लाए ।

3 साल तक कोई आयत नहीं उतरा

रही यह बात कि आयत कितने दिनों तक बन्द रही , तो इस सिलसिले में इब्ने साद ने इब्ने अब्बास रज़ि० से एक रिवायत नक़ल की है , जिसका सार यह है कि यह रोक कुछ दिनों के लिए थी और सारे पहलुओं पर नज़र डालने के बाद यही बात ज़्यादा यक़ीनी मालूम होती है और यह जो मशहूर है कि आयत पर रोक तीन या ढाई साल तक रही , तो बिल्कुल सही नहीं । रिवायतों और विद्वानों की रायों पर नज़र डालने के बाद मैं एक विचित्र नतीजे पर पहुंचा हूं , जिसका उल्लेख किसी विद्वान के यहां नहीं है ।
    इसका स्पष्टीकरण यह है कि रिवायतों और विद्वानों के कथनों से मालूम होता है कि आप मोहम्मद हिरा की गुफा में हर साल एक महीना तशरीफ़ रखते थे और यह रमज़ान का महीना हुआ करता था । यह काम आपन नुबूवत के तीन साल पहले से शुरू किया था और नुबूवत के साथ इस काम का आखिरी साल था । फिर रमज़ान के खात्मे के साथ हिरा में आपका ठहरना खत्म हो जाता था और आप सुबह को , यानी पहली शव्वाल की सुबह को घर वापस आ जाते थे । इधर दोनों सहीहों की रिवायतों में यह बात स्पष्ट रूप से बयान की गई है कि आयत पर रोक लगने के बाद दोबारा जिस वक़्त आयत आनी शुरू हुई है , उस वक़्त आप हिरा की गुफा में अपने ठहरने का महीना पूरा करके घर तशरीफ़ ला रहे थे
    इससे यह नतीजा निकलता है कि जिस रमज़ा में आप मोहम्मद को नुबूवत मिली और आयत आनी शुरू हुई , उसी रमज़ान के खात्मे के बाद पहली शव्वाल को दोबारा वस्य आई , क्योंकि यह हिरा में आपके ठहरने का आखिरी मौका था और जब यह बात साबित है कि आप पर पहली वस्य 21 रमजान सोमवार की रात उतरी तो उसका अर्थ यह हुआ कि वस्य पर रोक कुल दस दिन थी और दोबारा उसका आना जमेरात ( वहस्पतिवार , पहली शव्वाल सन् 01 नुबूवत को हुआ और शायद यही वजह है कि रमजान के आखिरी दहे को एतकाफ के लिए खास किया गया है और पहली शव्वाल को ईद के लिए । ( अल्लाह बेहतर जाने ) आयत पर इस रोक की मुद्दत में मोहम्मद  दुखी रहे और आप चकित थे , इसलिए सहीह बुखारी ' किताबुत्ताबीर ' की रिवायत है कि
   ' आयत बन्द हो गई , जिससे मोहम्मद इतने दुखी हुए कि कई बार ऊंचे पहाड़ की चोटियों पर तशरीफ ले गए कि वहां से लुढ़क जाएं , लेकिन जब किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंचते कि आप अपने आपको लुढ़का दें , तो हज़रत जिबील प्रकट होते और फ़रमाते , ऐ मुहम्मद ! आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं और इसकी वजह से आपकी बेचैनी थम जाती , जी को करार आ जाता और आप वापस आ जाते । फिर जब आप पर आयत की बन्दिश लंबी हो जाती तो आप फिर उसी जैसे काम के लिए निकलते , लेकिन जब पहाड़ की चोटी पर पहुंचते तो हज़रत जिबील प्रकट होकर फिर वही बात दोहराते ।